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17 जुल॰ 2019

Surdas ke Dohe in hindi सूरदास के दोहे और उनका हिन्दी अर्थ

Surdas ke Dohe सूरदास के दोहे

सूरदास 16वीं सदी के नेत्रहीन हिंदू भक्ति कवि और गायक थे, जो कृष्ण की प्रशंसा में लिखे गए अपने दोहे के लिए जाने जाते हैं. वे आमतौर पर ब्रजभाषा में लिखते थे, जो हिंदी की दो साहित्यिक बोलियों में से एक है.

सूरदास को वल्लभ आचार्य की शिक्षाओं से प्रेरणा मिली जिन्हें वह 1510 में मिले थे. उनके बारे में कई कहानियां हैं, लेकिन ज्यादातर यह कहा जाता है कि वह अपने जन्म से अंधे थे.
Surdas ke Dohe
सूर सागर नामक पुस्तक उनके द्वारा लिखी प्रमुख किताब है. आज के इस लेख में हम आपको कुछ मशहूर सूरदास के दोहे (Surdas ke Dohe) और उनका हिन्दी अर्थ बताने जा रहे हैं.


Surdas Ke Dohe with Hindi meaning सूरदास के दोहे

सूरदास के दोहे 1 - Surdas Ke Dohe 1

दोहा - अंखियां हरि-दरसन की प्यासी देख्यौ चाहति कमलनैन कौ¸ निसि-दिन रहति उदासी।। आए ऊधै फिरि गए आंगन¸ डारि गए गर फांसी। केसरि तिलक मोतिन की माला¸ वृन्दावन के बासी।। काहू के मन को कोउ न जानत¸ लोगन के मन हांसी। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस कौ¸ करवत लैहौं कासी.

अर्थ - इस दोहे में श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल गोपियों की मनोदशा का अद्भुत चित्रण किया गया है. राग घनाक्षरी पर आधारित सूरदास जी का यह पद भगवान से मिलने के लिये भक्त की व्याकुलता दर्शाता है। गोपियां श्रीकृष्ण के विरह में व्याकुल होकर कहती हैं कि हे हरि! हमारी आंखें तुम्हारे दर्शनों के लिए प्यासी हैं। हे कमल नयन! ये नेत्र आप ही के दर्शनों की इच्छुक हैं, आपके बिना यह दिन-रात उदास रहती हैं। इस पर भी उद्धव यहां आकर हमें ब्रह्म ज्ञान का उपदेश ग्रहण करने की बात कहकर दुविधा में डाल गए हैं। हे वृंदावन वासी, केसर का तिलक लगाने वाले व मोतियों की माला धारण करने वाले श्रीकृष्ण! किसी के मन की कौन जाने! लोग तो हंसी उडाना ही जानते हैं। सूरदास आगे कहते हैं कि गोपियां श्रीकृष्ण के दर्शन करके ही स्वयं को धन्य करना चाहती हैं। ठीक वैसे ही जैसे काशी, प्रयाग आदि स्थानों में प्राण देने पर लोग समझते हैं कि उनकी मुक्ति हो गई। गोपियां भी कृष्ण दर्शनों में ही स्वयं को मुक्त समझती हैं.

सूरदास के दोहे 2 - Surdas Ke Dohe 2

दोहा - मधुकर! स्याम हमारे चोर। मन हरि लियो सांवरी सूरत¸ चितै नयन की कोर।। पकरयो तेहि हिरदय उर-अंतर प्रेम-प्रीत के जोर। गए छुड़ाय छोरि सब बंधन दे गए हंसनि अंकोर।। सोबत तें हम उचकी परी हैं दूत मिल्यो मोहिं भोर। सूर¸ स्याम मुसकाहि मेरो सर्वस सै गए नंद किसोर।।

अर्थ - गोपिकाऐं भ्रमर को संबोधन करके,उद्धवजी को अपनी वेदना सुना रही है "हे मधुकर !! श्याम हमारा चोर है !! उन्होने,अपनी मधुर वाणी से, चंचल कटाक्ष से हमारा मन चुरा लिया है, हमने तो उन्हें हमारे दिल में, प्रेम और प्रीती से बांध रखा था लेकिन वो सब बंधन छुडाकर चल पडे और दे गये अपना मद-मधुर हास्य !! रातभर हम उनकी यादों से चौंक उठते है और सुबह में उनके दूत- भ्रमर का दर्शन होता है!! श्रीकृष्ण जी,अपना मंद-मधुर-हास्य से हमारा सब कुछ लूंट कर ले गए.

सूरदास के दोहे 2 - Surdas Ke Dohe 2

दोहा - चरन कमल बंदौ हरि राई । जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै आंधर कों सब कछु दरसाई॥ बहिरो सुनै मूक पुनि बोलै रंक चले सिर छत्र धराई । सूरदास स्वामी करुनामय बार-बार बंदौं तेहि पाई.
Surdas ke dohe
अर्थ - श्रीकृष्ण की कृपा होने पर लंगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को पार कर सकता है, अन्धे को भी सबकुछ दिखाई देने लगता है, बहरा व्यक्ति भी सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है और गरीब व्यक्ति भी अमीर हो जाता है. ऐसे दयालु श्रीकृष्ण की चरण वन्दना कौन नहीं करना चाहेगा?

सूरदास के दोहे 3 - Surdas Ke Dohe 3

दोहा - मुखहिं बजावत बेनु धनि यह बृंदावन की रेनु। नंदकिसोर चरावत गैयां मुखहिं बजावत बेनु॥ मनमोहन को ध्यान धरै जिय अति सुख पावत चैन। चलत कहां मन बस पुरातन जहां कछु लेन न देनु॥ इहां रहहु जहं जूठन पावहु ब्रज बासिनि के ऐनु। सूरदास ह्यां की सरवरि नहिं कल्पबृच्छ सुरधेनु॥

अर्थ - यह ब्रज की मिट्टी भी धन्य है जहाँपर श्रीकृष्ण गायों को चराया करते हैं और अधरों पर रखकर बांसुरी बजाते हैं. इस भूमि पर कृष्ण का ध्यान करने से मन को बहुत ज्यादा शांति मिलती है. सूरदास मन को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि अरे मन! तुम क्यों इधर-उधर भटकते हो. ब्रज में हीं रहो, यहाँ न किसी से कुछ लेना है, और न किसी को कुछ देना है. ब्रज में रहते हुए ब्रजवासियों के जूठे बरतनों से जो कुछ मिले उसी को ग्रहण करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति है. सूरदास कहते हैं कि ब्रजभूमि की समानता कामधेनु गाय भी नहीं कर सकती है.

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Surdas Ke Dohe with Hindi meaning सूरदास के दोहे

सूरदास के दोहे 4 - Surdas Ke Dohe 4

दोहा - मुख दधि लेप किए सोभित कर नवनीत लिए। घुटुरुनि चलत रेनु तन मंडित मुख दधि लेप किए॥ चारु कपोल लोल लोचन गोरोचन तिलक दिए। लट लटकनि मनु मत्त मधुप गन मादक मधुहिं पिए॥ कठुला कंठ वज्र केहरि नख राजत रुचिर हिए। धन्य सूर एकौ पल इहिं सुख का सत कल्प जिए॥

अर्थ - भगवान श्रीकृष्ण अभी बहुत छोटे हैं और यशोदा के आंगन में घुटनों के बल चल रहे हैं. उनके छोटे हाथों में ताजा मक्खन है और वे मक्खन को लेकर घुटनों के बल चल रहे हैं. उनके शरीर पर मिट्टी लगी हुई है. मुँह पर दही लिपटा हुआ है, उनके गाल सुंदर हैं और आँखें बेहद आकर्षक हैं. ललाट पर गोरोचन का तिलक लगा हुआ है. बालकृष्ण के बाल घुंघराले हैं. जब वे घुटनों के बल माखन लिए हुए चलते हैं तब घुंघराले बालों की लटें उनके कपोल पर झूमने लगती है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है मानो भौंरा मधुर रस पीकर मतवाला हो गया है. उनका सौंदर्य उनके गले में पड़े कंठहार और सिंह नख से और बढ़ जाता है. सूरदास कहते हैं कि श्रीकृष्ण के इस बालरूप का दर्शन यदि एक पल के लिए भी हो जाता तो जीवन सार्थक हो जाता है. अन्यथा सौ कल्पों तक भी यदि जीवन निरर्थक हीं है.


सूरदास के दोहे 5 - Surdas Ke Dohe 5

दोहा - मोहिं प्रभु तुमसों होड़ परी। ना जानौं करिहौ जु कहा तुम नागर नवल हरी॥ पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी। मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥ एक अधार साधु संगति कौ रचि पचि के संचरी। भ न सोचि सोचि जिय राखी अपनी धरनि धरी॥ मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु पूंछत पहर घरी। स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं कत यह जकनि करी॥ सूरदास बिनती कहा बिनवै दोषहिं देह भरी। अपनो बिरद संभारहुगै तब यामें सब निनुरी॥

अर्थ - हे प्रभु, मैंने तुमसे एक होड़ लगा ली है. तुम्हारा नाम पापियों का उद्धार करने वाला है, लेकिन मुझे इस पर विश्वास नहीं है. आज मैं यह देखने आया हूँ कि तुम कहाँ तक पापियों का उद्धार कर सकते हो? तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह कर लिया है. इस बाजी में देखना है कौन जीतता है. मैं तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों से बचकर, पाप-पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं.

सूरदास के दोहे 6 - Surdas Ke Dohe 6

दोहा - अबिगत गति कछु कहति न आवै। ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥ परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै। मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥ रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै। सब बिधि अगम बिचारहिं तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥

अर्थ - यहाँ अव्यक्त उपासना को मनुष्य के लिए क्लिष्ट बताया है. निराकार ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है. वह मन और वाणी का विषय नहीं है. ठीक उसी प्रकार जैसे किसी गूंगे को मिठाई खिला दी जाए, तो वह मिठाई का स्वाद नहीं बता सकता है. उस मिठाई के रस का आनंद केवल उसका अंतर्मन हीं जानता है. निराकार ब्रह्म का न रूप है, न गुण. इसलिए मन वहाँ स्थिर नहीं हो सकता है, सभी तरह से वह अगम्य है. इसलिए सूरदास सगुण ब्रह्म अर्थात श्रीकृष्ण की लीला का ही गायन करना उचित समझते हैं.

सूरदास के दोहे 7 - Surdas Ke Dohe 7

दोहा - खेलौ जाइ स्याम संग राधा। यह सुनि कुंवरि हरष मन कीन्हों मिटि गई अंतरबाधा॥ जननी निरखि चकित रहि ठाढ़ी दंपति रूप अगाधा॥ देखति भाव दुहुंनि को सोई जो चित करि अवराधा॥ संग खेलत दोउ झगरन लागे सोभा बढ़ी अगाधा॥ मनहुं तडि़त घन इंदु तरनि ह्वै बाल करत रस साधा॥ निरखत बिधि भ्रमि भूलि पर्यौ तब मन मन करत समाधा॥ सूरदास प्रभु और रच्यो बिधि सोच भयो तन दाधा॥

अर्थ - रास रासेश्वरी राधा और रसिक शिरोमणि श्रीकृष्ण एक ही अंश से अवतरित हुये थे। अपनी रास लीलाओं से ब्रज की भूमि को उन्होंने गौरवान्वित किया। वृषभानु व कीर्ति (राधा के माँ-बाप) ने यह निश्चय किया कि राधा श्याम के संग खेलने जा सकती है। इस बात का राधा को पता लगा तब वह अति प्रसन्न हुई और उसके मन में जो बाधा थी वह समाप्त हो गई थी। (माता-पिता की स्वीकृति मिलने पर अब कोई रोक-टोक रही ही नहीं, इसी का लाभ उठाते हुए राधा श्यामसुंदर के संग खेलने लगी।) जब राधा-कृष्ण खेल रहे थे तब राधा की माता दूर खड़ी उन दोनों की जोड़ी को, जो अति सुंदर थी, देख रही थीं। दोनों की चेष्टाओं को देखकर कीर्तिदेवी मन ही मन बहुत प्रसन्न हो रही थीं। तभी राधा और कृष्ण खेलते-खेलते झगड़ पड़े। उनका झगड़ना भी सौंदर्य की पराकाष्ठा ही थी। ऐसा लगता था मानो दामिनी व मेघ और चंद्र व सूर्य बालरूप में आनंद रस की अभिवृद्धि कर रहे हों। यह देखकर ब्रह्म भी भ्रमित हो गए और मन ही मन विचार करने लगे। सूरदास कहते हैं कि ब्रह्म को यह भ्रम हो गया कि कहीं जगत्पति ने अन्य सृष्टि तो नहीं रच डाली। ऐसा सोचकर उनमें ईष्र्याभाव उत्पन्न हो गया।

सूरदास के दोहे 8 - Surdas Ke Dohe 8

दोहा - आजु हरि धेनु चराए आवत। मोर मुकुट बनमाल बिराज पीतांबर फहरावत॥ जिहिं जिहिं भांति ग्वाल सब बोलत सुनि स्त्रवनन मन राखत। आपुन टेर लेत ताही सुर हरषत पुनि पुनि भाषत॥ देखत नंद जसोदा रोहिनि अरु देखत ब्रज लोग। सूर स्याम गाइन संग आए मैया लीन्हे रोग॥

अर्थ - इस दोहे में सूरदास जी ने उस समय का अप्रतिम वर्णन किया है जब भगवान् बालकृष्ण पहले दिन गाय चराने वन में जाते है, यह पद राग गौरी में बद्ध है। आज प्रथम दिवस श्रीहरि गौओं को चरा कर आए हैं। उनके शीश पर मयूरपुच्छ का मुकुट शोभित है, तन पर पीतांबरी धारण किए हैं। गायों को चराते समय जिस प्रकार से अन्य ग्वाल-बाल शब्दोच्चारण करते हैं उनको श्रवण कर श्रीहरि ने हृदयंगम कर लिया है। वन में स्वयं भी वैसे ही शब्दों का उच्चारण कर प्रतिध्वनि सुनकर हर्षित होते हैं। नंद, यशोदा, रोहिणी व ब्रज के अन्य लोग यह सब दूर ही से देख रहे हैं। सूरदास कहते हैं कि जब श्यामसुंदर गौओं को चराकर आए तो यशोदा ने उनकी बलैयां लीं।

सूरदास के दोहे 9 - Surdas Ke Dohe 9

दोहा - चली ब्रज घर घरनि यह बात। नंद सुत संग सखा लीन्हें चोरि माखन खात॥ कोउ कहति मेरे भवन भीतर अबहिं पैठे धाइ। कोउ कहति मोहिं देखि द्वारें उतहिं गए पराइ॥ कोउ कहति किहि भांति हरि कों देखौं अपने धाम। हेरि माखन देउं आछो खाइ जितनो स्याम॥ कोउ कहति मैं देखि पाऊं भरि धरौं अंकवारि। कोउ कहति मैं बांधि राखों को सकैं निरवारि॥ सूर प्रभु के मिलन कारन करति बुद्धि विचार। जोरि कर बिधि को मनावतिं पुरुष नंदकुमार॥

अर्थ - भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला से संबंधित सूरदास जी का यह पद राग कान्हड़ा पर आधारित है। ब्रज के हर घर में इस बात की चर्चा हो गई कि नंदपुत्र श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ चोरी करके माखन खाते हैं। एक स्थान पर कुछ ग्वालिनें ऐसी ही चर्चा कर रही थीं। उनमें से कुछ ग्वालिन बोली कि अभी कुछ देर पहले तो वह मेरे ही घर में आए थे। कुछ बोली कि मुझे दरवाजे पर खड़ी देखकर वह भाग गए। एक ग्वालिन बोली कि किस प्रकार कन्हैया को अपने घर में देखूं। मैं तो उन्हें इतना अधिक और उत्तम माखन दूं जितना वह खा सकें। लेकिन किसी भांति वह मेरे घर तो आएं। तभी दूसरी ग्वालिन बोली कि यदि कन्हैया मुझे दिखाई पड़ जाएं तो मैं गोद में भर लूं। एक अन्य ग्वालिन बोली कि यदि मुझे वह मिल जाएं तो मैं उन्हें ऐसा बांधकर रखूं कि कोई छुड़ा ही न सके। सूरदास कहते हैं कि इस प्रकार ग्वालिनें प्रभु मिलन की जुगत बिठा रही थीं। कुछ ग्वालिनें यह भी विचार कर रही थीं कि यदि नंदपुत्र उन्हें मिल जाएं तो वह हाथ जोड़कर उन्हें मना लें और पतिरूप में स्वीकार कर लें।



सूरदास के बारे मेँ और अधिक जाने - Surdas Wikipedia

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