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8 अप्रैल 2018

भगवद गीता हिंदी में | Bhagavad Gita in Hindi, गीता सार जीवन बदल जाएगा एक बार जरूर पढ़े

भगवद गीता सार हिंदी में | Bhagavad Gita in Hindi

मैंने श्रीमद भगवदगीता (Bhagavad gita) तब तक नहीं पढ़ी थी जब तक मुझे यह ज्ञान नहीं हुआ कि हम सब आत्माएं है और यह जिंदगी हम आत्माओं के लिए एक इम्तिहान है अपने अंदर से अपने सबसे अच्छे रूप को बाहर निकालने का और भगवत गीता इस इम्तिहान को पास करने की एक अहम किताब है भगवत गीता के 18 अध्याय हैं और यह संस्कृत में परमात्मा द्वारा दी गई थी, समय के साथ संस्कृत भाषा रोजमर्रा की जिंदगी से निकल गई और यह ज्ञान मनुष्य से दूर हो गया समय-समय पर भगवत गीता के साधारण अक्षरों में अनुवाद किया गया इसी कोशिश को आगे बढ़ाते हुए भगवद गीता के कुछ अहम् हिस्सों को अपने गुरु के आशीर्वाद से एक आसान रूप में मैं अपने करोड़ों भाई-बहनों के चरणों में समर्पित कर रहा हूं।
भगवद गीता
यह ज्ञान परमात्मा ने भगवान कृष्ण के द्वारा सबसे बड़े धर्मयुद्ध महाभारत की रणभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन को कुछ 5000 साल पहले दिया। यह वह वक्त था जब धर्म का बार-बार उल्लंघन हुआ परमात्मा का डर मनुष्य से निकल गया, लालच की होड़ में भाई ने भाई को मारने की कोशिश की और यही नहीं एक सुहागन औरत को भरी सभा में अपने बड़ों के सामने अपमानित किया गया। इससे पहले के मनुष्य जाति धर्म युग से निकलकर पूर्ण रूप से कलयुग में जाति, युद्ध की रणभूमि में युद्ध से कुछ पहले परमात्मा ने गीता, भगवान कृष्ण के द्वारा मनुष्य जाति के कल्याण के लिए दी। गीता, बाइबल, कुरान और गुरु ग्रन्थ साहिब परमात्मा द्वारा दी गयी किताबें है जो किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि पूरी मनुष्य जाति के लिए, पूरी इंसानियत के लिए, सब आत्माओं के लिए है क्योंकि यह आत्मा को परमात्मा के बारे में, उसकी सृष्टि के बारे में और उनके बारे में समझती हैं जिनका आत्मा को मनुष्य के रूप में हर हाल में पालन करना होगा, रक्षा करनी होगी और इन्हीं कार्यों की बुनियाद पर एक आत्मा को शरीर त्यागने के बाद परखा जाएगा परीक्षा में पास होने पर हमेशा के लिए जन्म और मृत्यु से मुक्ति मिलेगी.


bhagavad gita
परमात्मा भगवद गीता (Bhagavad gita) में कहते हैं कि मैं ही सब की शुरुआत हूं, मैं शुरु से भी पहले था और सब खत्म होने के बाद भी रहूंगा, सब मुझ में है और मैं सब में हूं, जो भी तुम छु सकते हो, देख सकते हो या सुन सकते हो वह सब मैं हु। यह नदियां, पहाड़, सूरज, ग्रहण, चांद, सितारे सब मैंने बनाएं है मैंने ही भगवान, शैतान, राक्षस और इंसान बनाए। मै सर्वव्यापी हु सब में रहता हूं, मैं ही ब्रह्मा बनके सब बनाता हूं और रुद्रा बनके सब नष्ट कर देता हूं. मैं यह सृष्टि यूं ही बनाता और तोड़ता रहूंगा ताकि आत्माओं को मौके मिल सके इस जन्म और मृत्यु से 1 दिन मोक्ष पाने के, हमेशा के लिए परमात्मा के साथ रहने के लिए।

भगवद गीता कहती है की इस सबसे बड़ी परीक्षा के लिए परमात्मा ने प्रकृति का निर्माण पांच तत्व हवा, अग्नि, जल, पृथ्वी और आकाश से किया, जिन्हें हम छू कर, चख कर, सुन कर और देखकर समझ सकते हैं पर खुद परमात्मा इन पांच इंद्रियों की समझ से बाहर है उन्हें आत्मा इन इंद्रियों से नहीं जान सकती। आत्मा पांच इंद्रियों के साथ वैसे ही है जैसे कि लोहे का रोबोट, जिसे अपने बनाने वाले का कोई पता नहीं अर्जुन को भी परमात्मा का विराट रुप देखने के लिए भगवान कृष्ण ने दिव्य नेत्र दिए।

आत्मा क्या है?

भगवत गीता (Bhagavad gita) समझाती है कि आत्मा अजन्मी है उसे कोई मार नहीं सकता, कोई जला नहीं सकता, डूबा नहीं सकता, काट नहीं सकता लेकिन आत्मा को परमात्मा के साथ हमेशा रहने के लिए यह परीक्षा रूपी जीवन में बैठना ही पड़ेगा इस परीक्षा के लिए परमात्मा से बिछड़कर आत्मा को पृथ्वी पर किसी न किसी रूप में जन्म लेना पड़ता है और अट्ठासी करोड़ों योनियों को जीने और भोगने के बाद एक आत्मा को मनुष्य का शरीर और दिमाग मिलता है इस सबसे बड़ी मर्यादाओं की परीक्षा में बैठने के लिए, हर मनुष्य को इस पूरी परीक्षा के दौरान तरह-तरह की अच्छी और बुरी भावनाओं के चक्रव्यूह में अपने ही भाई बहन एवं मित्रों के साथ डाला जाता है जिसमें हर आत्मा को अपने अंदर के तामसिक और राजसिक अवगुणों से निकल के सात्विक जीवन में प्रवेश करने के मौके मिलते हैं हमारे तामसिक गुण वह है जो हमारे अंदर हीन भावना पैदा करके हमें खुद को उदास और नुकसान पहुंचाते हैं और हमारे राजसिक गुण हमें ईर्ष्यालु और लोभी बनाकर दूसरों के प्रति नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस परीक्षा के दौरान हर आत्मा को तामसिक और राजसिक गुणों को खत्म करके अपने सात्विक गुणों से परिचित होना पड़ेगा सात्विक गुण वह है जो आत्मा को अपने आसपास की हर चीज से जोड़े और उन्हें प्यार करना सिखाते हैं।

जीवन की परीक्षा को समझें

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परीक्षा के दौरान हर आत्मा को जीवन के चार स्तम्भ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान पाकर ही मुक्ति मिलती है यही वो द्वार है जिन्हें समझ के ही आत्मा परमात्मा को समझ सकती है।

भगवद गीता (Bhagavad Gita) के अनुसार धर्म क्या है?

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पहला द्वार धर्म का है और इसका प्रतीक है शेर, धर्म वही है जो गीता में लिखा हुआ है, वेदों में लिखा हुआ है, बाइबल में लिखा है, गुरु ग्रन्थ साहिब और कुरान में लिखा हुआ है. धर्म वही है जो धारण किया हुआ है जिसे आपका दिल मानता है जैसे झूठ नहीं बोलना, चोरी नहीं करना, भगवान का निरादर नहीं करना दूसरों को नुकसान नहीं देना, यही सब धर्म है और हर आत्मा को अपने जीवन काल में हर समय धर्म का पालन करना होगा और उसकी रक्षा करनी होगी।

भगवद गीता (Bhagavad Gita) के अनुसार अर्थ क्या है?

दूसरा द्वार अर्थ का है और घोड़ा इसका प्रतीक है हर आत्मा अपने हर जीवन काल में अपने पृथ्वी पर होने का अर्थ या मूल कारण समझे. जिंदगी में भोगने वाली चीजें और रिश्तो का आनंद ले अच्छा बेटा या अच्छी बेटी, अच्छा भाई या अच्छी बहन, अच्छा पति या अच्छी पत्नी बनकर हर दुनियावी रिश्ते पर खरी उतरेगी और इस परीक्षा को पास करेगी।

भगवद गीता (Bhagavad Gita) के अनुसार काम क्या है?

तीसरा द्वार काम का है, भगवत गीता (Bhagavad gita) समझाती है कि हर मनुष्य के अंदर काम,क्रोध,लोभ,मोह,अहंकार और ईर्ष्या जैसी भावनाएं हमें अपने और दूसरों के प्रति नुकसान पहुंचा सकती है इन भावनाओं को हर मनुष्य को हमेशा अपने नियंत्रण में रखना होगा क्योंकि इनके बहाव में किया हुआ कोई भी काम हमारे जीवन भर की परेशानी का कारण बन सकता है और एक आत्मा संतोष और सादगी से इन भावनाओं पर हमेशा के लिए विजय पा सकती है।

भगवद गीता (Bhagavad Gita) के अनुसार मोक्ष क्या है?

चौथा स्तंभ मोक्ष का है और हाथी इसका प्रतीक है इस परीक्षा रुपी जीवन में हर मनुष्य हर समय कुछ इच्छाएं रखता है कुछ इच्छाएं एक ही जन्मकाल में पूरी हो जाती हैं पर कुछ अधूरी रह जाती हैं और उनके पूरा होने के लिए आत्मा को वापस पृथ्वी पर आना पड़ता है। भगवत गीता समझाती है कि हमारी इच्छाएं ही मूल कारण है हमारे पृथ्वी पर वापस आने का और अगर हम कोई भी इच्छा ना रखे तो हम इस जीवन और मृत्यु से मुक्त हो सकते हैं। यह द्वार माफी का भी है जिन्होंने आपके साथ बुरा किया उनको माफ़ करके और जिनसे आप ने बुरा किया उनसे माफी मांग कर मुक्ति पाई जा सकती है।

जब तक आत्मा इन चारों दरवाजों धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को समझ नहीं लेती तब तक आत्मा को बार-बार इस मनुष्य रूप में आना ही पड़ेगा। परीक्षा का समय खत्म होते ही आत्मा शरीर और अन्य सब वस्तुओं का त्याग कर देती है। जो भी संसार में रहकर बनाया वह अब किसी और का होगा और आत्मा अपने कर्मों के फैसले के लिए चली जाती है। आत्मा के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब होता है अपने अच्छे कर्मों के लिए आत्मा कुछ वक्त के लिए स्वर्ग और दुष्कर्मों के लिए नरक चली जाती है। नरक में आत्मा को अपने पापों के अनुकूल सजाएं मिलती है और सजा खत्म होने के बाद आत्मा को फिर से एक नया शरीर और नया दिमाग मिलता है इस परीक्षा में फिर से बैठने के लिए और हर परीक्षा में वही सब फिर दोहराया जाएगा जिंदगी के चार स्तंभ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को समझने के लिए।  हर जन्म में अपने कई जन्मों के कर्मों के हिसाब से हर आत्मा को कभी अच्छे और कभी बुरे हालातों से जाना पड़ता है लेकिन जब तक आत्मा परमात्मा के साथ योग को नहीं समझ लेती वह मुक्ति नहीं पा सकती।


भगवद गीता (Bhagavad Gita) के अनुसार भगवन को कैसे प्राप्त करें?

भगवत गीता (Bhagavad gita)समझाती है कि मनुष्य अपने शरीर दिमाग या दिल से भगवान को पा सकता है शरीर द्वारा किए कर्मों के माध्यम से परमात्मा को पाने को कर्मयोग कहते हैं ऐसे कर्म जो परमात्मा की इच्छा से हो और दूसरों के कल्याण के लिए हो, वाल्मीकि ने रामायण लिखकर, श्रवन ने अपने माता-पिता की सेवा और उन्हें चार धाम की यात्रा करवा कर, मदर टेरेसा ने अपने प्यार और सेवा के माध्यम से और मैडम क्यूरी ने वैज्ञानिक खोज में अपने जीवन का बलिदान देकर अपने कर्मों द्वारा परमात्मा को पाया। भगवत गीता समझाती है कि आत्मा दिमाग से भी परमात्मा के साथ योग लगा सकती है इसे राजा योग कहते हैं क्योंकि दिमाग या मस्तिष्क सब इंद्रियों का राजा है एक मनुष्य अपनी आस्था, सांस प्रणाली, अभ्यास, साधना और तपस्या से परमात्मा को इस योग के रास्ते पा लेता है। योग को समझने के लिए हमें अपने अंदर की एनर्जी यानी चक्र और कुंडलिनी को समझना पड़ेगा। आत्मा मस्तिस्क से मेडिटेशन या ध्यान लगाकर परमात्मा के साथ योग लगा सकती है। शंकराचार्य, स्वामी परमहंस, स्वामी विवेकानंद और उनके जैसे कई योगी इस योग के रास्ते परमात्मा के साथ संधि लगा पाए।

परमात्मा भगवत (Bhagavad gita) गीता में कहते हैं कि अगर किसी आत्मा को धर्म ना भी समझ आए, योग ना भी समझ आए तो अगर वो मेरी शरण में आ जाए तो मैं उसके सारे पाप माफ कर देता हूं परमात्मा को ऐसी दिल की गहराइयों से पुकार के पाने को भक्ति योग कहते हैं। चैतन्य महाप्रभु, मीराबाई और भगवान हनुमान इस योग के सबसे बड़े उदाहरण है लेकिन कभी आत्मा अपने होने का मूल कारण भूलकर धर्म का उल्लंघन करें या पाप के रास्ते पर निकल जाए तो उसे ठीक करने के लिए परमात्मा खुद किसी रूप में पृथ्वी पर जन्म लेते हैं।

आइए श्री भगवत गीता, गुरु ग्रंथ साहिब, बाइबल, कुरान या ऐसी किसी भी किताब को पूरा पढ़ कर इस जिंदगी के असली मायने समझें और परमात्मा के साथ योग लगाएं। अगर आपने इस पोस्ट को पसंद किया तो इसे अन्य के साथ भी बाटें ताकि सब आत्माएं अपने यहां होने का मूल रूप समझ सके और इस जन्म और मृत्यु से मुक्ति पा के हमेशा परमात्मा के साथ रहें।

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